अभिमन्यु— वह प्रकाश जिसकी मृत्यु से महाभारत काँप उठा
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| अभिमन्यु चक्रव्यूह में प्रवेश करते हुए — साहस और वीरता का प्रतीक। |
1. कुरुक्षेत्र की हवा में तूफ़ान का संकेत
तेरहवें दिन की सुबह थी।
कुरुक्षेत्र की रेत पर रात की ओस अभी भी चमक रही थी।
आसमान में एक गहरी सुस्ती थी,
मानो सूरज भी सोच रहा हो
कि आज उसकी किरणें कितनी खून और आँसू देख पाएँगी।
युद्धभूमि के दोनों छोरों पर सेना तैयारी में लगी थी।
लेकिन उस दिन वातावरण में कुछ और ही था—
एक अनजाना भय, एक गहरा मौन,
और एक ऐसा संकेत
जिसे सिर्फ संवेदनशील हृदय ही महसूस कर सकते थे।
दूर पांडव शिविर में
एक सत्रह वर्षीय युवा अपनी कवच-धारण की रस्म पूरी कर रहा था।
चेहरा गंभीर था,
पर आँखें स्थिर…
जैसे किसी गहरे निर्णय पर पहुँच चुकी हों।
वह था—
अभिमन्यु
अर्जुन और सुभद्रा का पुत्र।
कृष्ण का भांजा।
और पांडवों की आशा।
2. कौरवों की चाल — चक्रव्यूह का पुनर्जन्म
दुर्योधन रात भर अपने सेनापति द्रोणाचार्य के साथ बैठा रहा था।
उसकी आँखों में सिर्फ एक ही भय था—
अर्जुन।
और उसकी रणनीति भी उसी भय की उपज थी।
“गुरुदेव,” उसने कहा,
“यदि आज अर्जुन हमारे सामने होगा,
तो हममें से कोई भी उनसे नहीं बच सकता।”
द्रोण ने शांत स्वर में उत्तर दिया—
“इसलिए आज ऐसी युद्धरचना होगी
जिसमें अर्जुन प्रवेश ही न कर सके।
और यदि कोई आए भी…
तो वापस न लौट सके।”
और यही वह क्षण था
जब द्रोणाचार्य ने घोषणा की—
“आज चक्रव्यूह रचा जाएगा।”
चक्रव्यूह—
एक ऐसी रणनीति
जिसे भेदना आसान था
पर निकलना असंभव।
इस रचना का उद्देश्य सिर्फ एक था—
पांडवों को किसी एक महत्वपूर्ण योद्धा से वंचित कर देना।
3. अर्जुन और कृष्ण को दूर मोड़ने का षड्यंत्र
कौरवों की दूसरी बड़ी योजना यह थी कि
अर्जुन और कृष्ण
इस जाल तक पहुँच ही न पाएँ।
सुबह-सुबह सुशर्मा और सामुद्रिक योद्धाओं ने
अर्जुन के क्षेत्र में हमला किया।
युधिष्ठिर ने अर्जुन और कृष्ण को आदेश दिया
कि वे उत्तर दिशा में जाकर उन्हें रोकें।
अर्जुन गए भी—
पर उन्हें पता न था
कि पीछे उनके पुत्र की नियति लिखी जा रही है।
कृष्ण ने पीछे मुड़कर देखा था।
उनकी आँखें कुछ पल के लिए थम गईं।
मानो उन्हें आभास हुआ हो
कि आज कुछ असाधारण होने वाला है।
पर समय—
कभी-कभी मौन रहकर ही बहुत कुछ कह देता है।
4. अभिमन्यु को बुलाया जाना — धर्म का सबसे कठोर आदेश
जब पांडवों ने देखा कि सामने चक्रव्यूह खड़ा है,
उनके चेहरे उतर गए।
चक्रव्यूह को तोड़ना
हर किसी के बस की बात नहीं थी।
युधिष्ठिर ने धीरज से पूछा—
“क्या किसी को इसका भेदन आता है?”
किसी ने कुछ नहीं कहा।
सब चुप थे।
सिर्फ एक युवा आगे बढ़ा।
“मैं अंदर जाना जानता हूँ, महाराज।”
उस आवाज़ में ना डर था,
ना अभिमान।
सिर्फ कर्तव्य की आभा थी।
“अभिमन्यु?”
युधिष्ठिर विस्मित हो उठे।
“तुम्हें इसका भेदन कैसे आता है?”
अभिमन्यु ने धीरे से उत्तर दिया—
“जब मैं माँ के गर्भ में था,
पिता ने माँ को इसका रहस्य बताया था।
प्रवेश का हिस्सा मैंने सुन लिया था,
पर निकास का…
उस समय माँ को नींद आ गई।”
यह कहते समय
उसकी आवाज़ में मासूमियत भी थी
और वीरत्व भी।
भीष्म की आँखों में वह क्षण
किसी स्मृति की तरह कौंध गया—
इतने छोटे योद्धा में इतनी दृढ़ता…
तुरंत मन श्रद्धा से भर उठा।
युधिष्ठिर कुछ पल चुप रहे।
फिर धीरज से बोले—
“बेटा, तुम्हें अकेले नहीं जाना होगा।
हम सब तुम्हारे पीछे आएँगे।”
अभिमन्यु मुस्कुराया—
“बस यही तो चाहता हूँ, महाराज।”
5. अभिमन्यु का रथ — जैसे सुबह का सूर्य युद्धभूमि में उतर आया हो
अभिमन्यु ने अपने रथ की रस्सियाँ पकड़ीं।
रथ के पहिए मिट्टी को चीरते आगे बढ़ने लगे।
उसके कवच की ध्वनि
मानो किसी पहाड़ी से गिरते झरने की तरह थी।
कौरवों के महावीर
सामने से आते हुए उस बालक को देखकर
अचंभित थे।
कर्ण ने हँसकर दुर्योधन से कहा—
“दुर्योधन, क्या यह बालक हमारे चक्रव्यूह को तोड़ेगा?”
दुर्योधन बोला—
“अगर इसे कम समझोगे,
तो यह तुम्हें भी पीछे छोड़ देगा।”
और वह सच कह रहा था।
अभिमन्यु का रथ आगे बढ़ा।
बाणों की वर्षा उस पर हुई,
पर वह
बाणों को ऐसे चीरता हुआ आगे गया
जैसे हवा सुबह की धुंध को चीर जाती है।
6. चक्रव्यूह का पहला घेरा — अभिमन्यु की चमक
पहले घेरे में सेनापति और हाथी-रथों की विशाल टुकड़ी थी।
पर अभिमन्यु ने अपनी गति बढ़ाई।
तीरों की बौछार की और
पहला घेरा
पलक झपकते टूट गया।
पीछे पांडव आ रहे थे।
अभिमन्यु के चेहरे पर विश्वास था।
लेकिन तभी
जयद्रथ सामने आ गया।
उसके पास शिव का वरदान था—
कि वह एक दिन में पांडवों को रोक सकता है।
उसने वही किया।
पांडव आगे बढ़े
लेकिन जयद्रथ से पार नहीं जा सके।
अभिमन्यु ने मुड़कर देखा।
उसकी आँखों में एक क्षण के लिए
हल्का सा डर आया—
“मैं अकेला रह गया…”
पर अगले ही पल
उस डर को उसने अपनी साँस के साथ निगल लिया।
7. चक्रव्यूह का दूसरा, तीसरा, चौथा घेरा — एक अकेला सिंह
अब अभिमन्यु अकेला था।
लेकिन यह अकेलापन
उसकी शक्ति बन गया।
दूसरे घेरे में प्रवेश करते हुए
उसके बाण
मानो बिजली की तरह गिर रहे थे।
कौरवों के कई योद्धा
एक ही क्षण में गिर पड़े।
अभिमन्यु का चेहरा उस समय ऐसा था
जैसे कोई तपस्वी
धर्मयुद्ध के लिए तपकर आया हो।
तीसरा घेरा टूटा।
चौथा भी।
कौरवों के शिविर में हलचल मच गई।
द्रोणाचार्य ने धीमे स्वर में कहा—
“यह युवा अर्जुन की परछाई है।
अगर इसे नहीं रोका,
तो पूरी योजना ध्वस्त हो जाएगी।”
8. कौरवों का नियम-भंग — युद्ध का सबसे काला अध्याय
जब अभिमन्यु पंचम घेरे में पहुँचा,
कर्ण, द्रोण, अश्वत्थामा, कृपाचार्य, शल्य, दुर्योधन —
ये सभी
चारों दिशाओं से उस पर टूट पड़े।
एक अकेले पर कई महारथियों का हमला
युद्ध का नियम नहीं था।
परंतु उस दिन
नियमों की मौत हो गई।
दुर्योधन चिल्लाया—
“इसे यहीं समाप्त करना होगा!”
कर्ण के बाणों ने
अभिमन्यु का धनुष काट दिया।
द्रोण ने रथ के घोड़े मार दिए।
कृपाचार्य ने सारथी गिरा दिया।
अश्वत्थामा ने ढाल तोड़ दी।
कर्ण ने फिर से वार किया—
अभिमन्यु का धनुष छीन गया।
अब वह निहत्था था।
पर पराजित नहीं।
9. अंतिम युद्ध — जब एक बच्चा देवताओं में शामिल हो गया
अभिमन्यु ने गिरा हुआ रथ का पहिया उठाया।
उसे ढाल की तरह घुमाया।
युद्धभूमि में यह दृश्य ऐसा था
कि वीर भी स्तब्ध रह गए—
एक सत्रह वर्षीय बालक,
हजारों योद्धाओं के बीच,
एक पहिया लिए खड़ा है।
वह आगे बढ़ा।
पहिया घुमाया।
दश-दिशाओं में कौरवों के योद्धा गिरे।
उसकी आँखों में केवल एक चमक थी—
“मैं धर्म की रक्षा करूँगा।”
कुछ पल तक
अभिमन्यु का रूप
मानो किसी देवता जैसा हो गया था।
उसके वक्ष से बहता रक्त,
कवच का टूटना,
पर चेहरा—
अटूट।
परंतु संख्या और छल
साहस पर भारी पड़ते हैं।
दुशासन का पुत्र
पीछे से आया
और गदा से अभिमन्यु के पीछे वार किया।
धम्म से आवाज़ आई।
अभिमन्यु लड़खड़ाया।
पर फिर संभला।
दूसरा वार।
तीसरा।
चौथा।
आखिरकार
वह धरती पर गिर पड़ा।
लेकिन उसके गिरते ही
पूरा कुरुक्षेत्र
कुछ क्षण के लिए मौन हो गया।
मानो धरती ने स्वयं
अपने हृदय से एक टुकड़ा खो दिया हो।
10. कृष्ण की आँखों का भीग जाना — एक मौन जो महाभारत बदल गया
उधर अर्जुन और कृष्ण
अब भी उत्तर दिशा में युद्ध कर रहे थे।
अचानक युधिष्ठिर का दूत दौड़ता हुआ आया
और अर्जुन के सामने गिर पड़ा—
“अभिमन्यु…
शहीद हो गया।”
रथ के पहिए थम गए।
अर्जुन कुछ पल तक
एकदम मौन रहे।
उनकी आँखें फैल गईं।
कृष्ण उनके पास खड़े थे।
उन्होंने कुछ नहीं कहा…
लेकिन उनकी आँखें गीली थीं।
वह मौन
एक महायुद्ध से भी बड़ा था।
अर्जुन ने धीरे से कहा—
“कृष्ण…
मेरे पुत्र का शव किसने गिराया?”
कृष्ण ने क्षितिज की ओर देखा और बोले—
“अर्जुन…
आज धर्म की हत्या हुई है।”
अर्जुन ने अपना धनुष कसकर पकड़ा—
और प्रतिज्ञा की:
“यदि सूर्यास्त से पहले जयद्रथ का वध न करूँ,
तो मैं अग्नि में प्रवेश कर जाऊँगा।”
यह प्रतिज्ञा
युद्ध की धारा मोड़ने वाली थी।
11. अभिमन्यु — सिर्फ एक योद्धा नहीं, एक युग का प्रतीक
अभिमन्यु की मृत्यु
केवल एक योद्धा की मृत्यु नहीं थी।
यह वह क्षण था
जिसने महाभारत को
उसकी सारी क्रूरता,
सारी नीति,
और सारी नियति में
एक नया मोड़ दे दिया।
अभिमन्यु का बलिदान
ने पांडवों के मन में
अग्नि जला दी—
ऐसी अग्नि
जो कुरुक्षेत्र को जला कर राख कर देगी।
12. एक माँ का दर्द, एक पिता का क्रोध, और इतिहास की अमरता
सुभद्रा
जब यह समाचार सुनकर बेहोश हुई,
कृष्ण ने उन्हें उठाया।
उनके आँसू रुके नहीं।
अर्जुन—
जो स्वयं लाखों लोगों के लिए प्रेरणा थे,
आज टूट गया।
और कृष्ण—
जो भगवान थे,
आज एक मामा थे।
उनकी आँखें भी भीग गईं।
परंतु नियति—
उन्हें आगे बढ़ने को कह रही थी।
13. अभिमन्यु की विरासत — धर्म की अनंत ज्वाला
अभिमन्यु की मृत्यु
केवल शोक नहीं थी,
बल्कि वह चिंगारी थी
जिसने अर्जुन, भीम और सभी पांडवों के भीतर
धर्म की अग्नि को भड़का दिया।
अभिमन्यु का नाम
उस दिन से
केवल एक योद्धा नहीं रहा—
वह बन गया—
-
युवावस्था का साहस
-
कर्तव्य का सर्वोच्च उदाहरण
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नियति के आगे झुकने से इनकार
-
अधर्म के सामने अकेले खड़े होने की शक्ति
अभिमन्यु अमर क्यों है?
क्योंकि वह जीतकर नहीं,
सही तरीके से लड़कर मरा था।
क्योंकि उसने उम्र से नहीं,
संकल्प से युद्ध लड़ा था।
क्योंकि उसने धर्म की रक्षा के लिए
अपनी अंतिम साँस तक लड़ाई लड़ी।
क्योंकि उसने सिखाया—
कि कभी-कभी
एक युवा का बलिदान
पूरी दुनिया की दिशा बदल सकता है।
अंत में…
अभिमन्यु की कथा कोई पुरानी कहानी नहीं है।
यह आज भी एक संदेश है—
कि साहस उम्र से नहीं आता,
धर्म परिस्थिति से नहीं बदलता,
और नायक वही है
जो अकेले खड़े होकर भी
अंधकार से टकराने की हिम्मत रखता है।
अभिमन्यु…
एक नाम नहीं,
एक प्रकाश है—
जो हर युग में
तपकर चमकता है।



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